अरावली पर्वतमाला: भारत की सबसे पुरानी पहाड़ी श्रृंखला, अस्तित्व पर मंडराता खतरा
यह तो हम सभी जानते हैं कि अरावली पर्वतमाला भारत की सबसे प्राचीन और ऐतिहासिक पहाड़ी श्रृंखलाओं में से एक है। यह केवल पहाड़ों की एक श्रृंखला नहीं है, बल्कि उत्तर भारत के पर्यावरण, जलवायु, वन्यजीव और मानव जीवन की रीढ़ भी है। आज यही अरावली खनन, अवैध निर्माण, औद्योगीकरण और गलत सरकारी नीतियों के कारण गंभीर संकट में है। पर्यावरणविद लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि अगर अरावली नहीं बची, तो उत्तर भारत का भविष्य भी सुरक्षित नहीं रहेगा। इस लिए हर हाल में अरावली को बचाना होगा।___________________________
अरावली पर्वतमाला का इतिहास: अरावली पर्वतमाला का इतिहास कोई नया नहीं है बल्कि लगभग 150 करोड़ वर्ष पुराना माना जाता है। यह दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है, जो हिमालय से भी कहीं अधिक पुरानी है। जब हिमालय बना भी नहीं था, तब से अरावली मौजूद है।
इतिहासकारों के अनुसार, अरावली पर्वतमाला ने सिंधु घाटी सभ्यता के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यहां से निकलने वाली नदियों ने उस समय की सभ्यताओं को पानी और उपजाऊ भूमि प्रदान की है। राजस्थान और हरियाणा के कई प्राचीन नगर अरावली के आसपास ही विकसित हुए थे। बड़े अफसोस की बात है कि इतनी महत्वपूर्ण ऐतिहासिक अरावली पर्वत श्रृंखला आज खतरे में हैं। आज इसे बचाने की कोशिश लगे लोग खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं।
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अरावली का भौगोलिक विस्तार (Geography of Aravali Range): अरावली पर्वतमाला की लंबाई लगभग 800 किलोमीटर तक है। अरावली का विस्तार इन राज्यों में है: गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली (दक्षिणी दिल्ली क्षेत्र) तक फैला हुआ है। इसकी शुरुआत गुजरात के पालनपुर से होती है और यह राजस्थान होते हुए हरियाणा और दिल्ली तक पहुंच जाती है। अरावली की सबसे ऊंची चोटी जिसका नाम गुरु शिखर (माउंट आबू) है, इसकी ऊंचाई लगभग 1722 मीटर है।
अरावली पर्वतमाला कई नदियों का उद्गम स्थल भी है, जिनमें प्रमुख हैं: साबरमती, लूनी, बनास और साहिबी (दिल्ली और हरियाणा क्षेत्र में)
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अरावली पर्वतमाला का पर्यावरणीय महत्व: अरावली पर्वतमाला का महत्व केवल पहाड़ होने तक सीमित नहीं है। यह उत्तर भारत के पर्यावरण के लिए एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच की तरह काम करती है। भारत का उत्तरी भाग अगर सुरक्षित है तो उसके पीछे अरावली है। आईए समझते है कि कैसे भारत के उत्तरी क्षेत्रों की रक्षा अरावली करती है।
1. रेगिस्तान को रोकने वाली दीवार: अरावली पर्वतमाला थार रेगिस्तान को पूर्व की ओर फैलने से रोकती है। अगर अरावली नष्ट हो गई, तो राजस्थान का रेगिस्तान हरियाणा, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक फैल सकता है। अरावली के न होने से इन क्षेत्रों में रेत के तूफान आ सकते हैं। यह सभी क्षेत्र रेगिस्तान में बदल सकते हैं।
2. जलवायु संतुलन: अरावली क्षेत्र तापमान को भी नियंत्रित करता है। यह गर्म हवाओं को रोकता है और मानसून के दौरान नमी को बनाए रखने में मदद करता है।
3. जल स्रोतों का संरक्षण: अरावली की चट्टानें वर्षा जल को रोककर भूजल रिचार्ज में मदद करती हैं। यही कारण है कि अरावली क्षेत्र के आसपास के इलाकों में जलस्तर अपेक्षाकृत बेहतर रहता है। जल है तो जीवन है यह बात अरावली के आस पास बसे इलाकों को देख कर अच्छे से समझ आती है।
4.जैव विविधता (Biodiversity): अरावली में कई दुर्लभ वनस्पतियां और जीव-जंतु पाए जाते हैं: जैसे कि... तेंदुआ, सियार, नीलगाय, मोर और सैकड़ों पक्षी प्रजातियां निवास करती है।
अरावली केवल इंसानों के लिए नहीं बल्कि, वनस्पतियों, अन्य जीव-जंतु के लिए भी बेहद ज़रूरी है।___________________________
दिल्ली-NCR के लिए अरावली का महत्व: दिल्ली और NCR क्षेत्र के लिए अरावली फेफड़ों की तरह काम करती है।
यह क्षेत्र...
- वायु प्रदूषण को कम करता है।
- धूल भरी आंधियों को रोकता है।
- तापमान संतुलन बनाए रखता है।
- आज जब दिल्ली दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में गिनी जाती है, तब अरावली का संरक्षण और भी ज़रूरी हो जाता है। सोचिए अरावली के होते हुए दिल्ली की यह हालत है, अगर अरावली न होती या न रही तब दिल्ली का क्या होगा? दिल्ली बिना परमाणु हमले के हो हिरोशिमा, नागासाकी बन जाएगी।___________________________
अरावली पर्वतमाला से जुड़े विवाद (Aravali Dispute): पिछले कुछ दशकों में अरावली क्षेत्र कई विवादों में घिरा रहा है। यह सभी विवाद निम्न प्रकार से हैं।
1. अवैध खनन: राजस्थान और हरियाणा में अरावली क्षेत्र में बड़े पैमाने पर पत्थर, बजरी, खनिज का अवैध खनन किया गया है। इससे पहाड़ों का स्वरूप ही बदल गया है।
2. रियल एस्टेट और निर्माण: दिल्ली-NCR में कई जगह अरावली की जमीन पर फार्महाउस, रिजॉर्ट, लग्ज़री प्रोजेक्ट बनाए गए हैं, जो कि पूरी तरह से पर्यावरण नियमों का खुला उल्लंघन हैं।
3. कानूनी अस्पष्टता: सरकारी रिकॉर्ड में कई जगह अरावली को “वन भूमि”, “गैर-वन भूमि” के रूप में अलग-अलग दर्ज किया गया है, जिससे कंपनियों को फायदा मिला और संरक्षण कमजोर हुआ। इसी कारण कंपनियों ने मनमानी तौर पर अरावली को नुकसान पहुंचाया है।___________________________
सुप्रीम कोर्ट और एनजीटी की भूमिका: भारत के सुप्रीम कोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने कई बार अरावली संरक्षण के आदेश दिए हैं। इन आदेशों में खनन पर रोक, अवैध निर्माण हटाने के निर्देश, पर्यावरण प्रभाव आकलन अनिवार्य इत्यादि शामिल हैं।
लेकिन हकीकत यह है कि जमीनी स्तर पर इन आदेशों का पालन पूरी तरह नहीं किया गया।___________________________
अरावली बचाओ आंदोलन और विरोध प्रदर्शन: पिछले कुछ वर्षों में “Save Aravali” “अरावली बचाओ” आंदोलन ने जोर पकड़ा है। आंदोलन में शामिल लोग पर्यावरण कार्यकर्ता, स्थानीय ग्रामीण, छात्र और सामाजिक संगठन हैं।
आंदोलनकर्ताओं की प्रमुख मांगें:
- अरावली को संरक्षित क्षेत्र घोषित किया जाए।
- खनन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाए जाएं।
- अवैध निर्माण हटाया जाए।
- अरावली को कानूनी रूप से “वन” का दर्जा दिया जाए।
सोशल मीडिया पर भी #SaveAravali अभियान चलाया गया, जिससे इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है। जो लोग आंदोलन से सीधे जुड़ नहीं सकते वो सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी आवाज़ सरकार तक पहुंचाने के लिए अपने अपने स्तर पर जो हो सका कर रहे हैं।
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सरकार की भूमिका और चुनौतियां: सरकार एक ओर विकास और रोजगार की तो बात करती है, वहीं दूसरी ओर पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी भी उसी की है। अरावली के मामले में सबसे बड़ी चुनौती यही है कि विकास बनाम पर्यावरण का संतुलन कैसे बनाया जाए। विशेषज्ञों का मानना है कि टिकाऊ विकास (Sustainable Development) ही एकमात्र रास्ता है। लेकिन सरकार इसमें नाकाम नज़र आ रही है।
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अगर अरावली नष्ट हुई तो क्या होगा?
पर्यावरण विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि अगर अरावली पर्वतमाला पूरी तरह नष्ट हो गई तो: दिल्ली-NCR में प्रदूषण और बढ़ेगा जिससे जीवन पूरी तरह से खतरे मे आ जाएगा। भूजल स्तर और गिरेगा गर्मी की तीव्रता बढ़ेगी, रेगिस्तान का विस्तार होगा, जैव विविधता खत्म हो जाएगी। यह केवल एक पर्यावरणीय संकट नहीं होगा, बल्कि मानव अस्तित्व का संकट होगा।
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अरावली को बचाने के उपाय क्या हैं:
1. सख्त कानून और उनका पालन: पर्यावरण कानूनों को केवल कागजों तक सीमित न रखा जाए। सभी कानूनों को ज़मीनी स्तर पर लागू करना होगा, उल्लंघन करने वालों पर सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए।
2. स्थानीय लोगों की भागीदारी: ग्रामीणों और स्थानीय समुदाय को संरक्षण में शामिल किया जाए। क्यों कि यह लोग पर्यावरण से जुड़े होते हैं, इनसे बेहतर कोई और नहीं समझ सकता कि पर्यावरण के लिए क्या है और क्या गलतम
3. पुनर्वनीकरण (Afforestation): अरावली क्षेत्र में बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण किया जाए। नष्ट कर दिए गए हर एक पड़ के बदले चार पेड़ लगाए जाने चाहिए।
4. जागरूकता अभियान: स्कूल, कॉलेज और मीडिया के जरिए लोगों को अरावली के महत्व के बारे में बताया जाए। आज के समय मीडिया से ऐसी उम्मीद रखना खुद को धोखा देने जैसा है। मैन स्ट्रीम मीडिया के बदले अब लोग सोशल मीडिया पर ज़्यादा भरोसा करते हैं और सोशल मीडिया ही एक मात्र ऑप्शन है जिससे इस अभियान को पूरे देश तक फैलाया जा सकता है।
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निष्कर्ष:
अरावली पर्वतमाला केवल पहाड़ों की श्रृंखला नहीं है, बल्कि यह उत्तर भारत की जीवन रेखा है। इसका संरक्षण किसी एक राज्य या सरकार की जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिए, यह पूरे देश की सामूहिक जिम्मेदारी है। अगर आज अरावली को नहीं बचाया गया, तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी।याद रखिए अरावली बचेगी, तभी भविष्य सुरक्षित रहेगा।
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